जीवन की कचहरी
विष का एक घुट मैं पी गया
एक सपना आज मेरा टूट गया।
वो प्यारा था, मन को भाया था
पर रेत सा हाथ से छूट गया।
मन रूष्ट रुष्ट, मन थका थका
कई प्रश्न बड़े, कई शक खड़े
मेरे अस्तित्व को झुठलाते हैं।
कचहरी में खड़ा करके, मुझपे आरोप लगाते हैं।
इन आरोपों का उत्तर देनें,
मेरे ही अतीत के गवाह
वर्तमान का हवाला देकर
मुझे ही झूठला जाते हैं।
हाँ, है समय की यही सजा
देख जीवन की यह भी दशा।
क्योंकि तू है अकेला, खड़ा यहाँ
असफलता का मंज़र है, बना जहाँ।
सबको क्यों बतलाएगा, सबको क्या समझाएगा
जीवन में अकेला ही जायेगा।
थे जो प्रश्न खड़े, जो तीर चले
मेरे मन के टुकड़े टुकड़े करते हैं
इल्ज़ाम अंत में मेरे ही सिर मढ़ देते हैं।
जीवन की कचहरी में हर पेशी में,
मुझे ही शामिल होना है।
मेरे जीवन का हर एक लम्हा, मुझे ही संजोना है।
Great piece 👌
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ReplyDeleteMeaningful
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