ख़्वाब

Found one of my old poems so thought of sharing it with you all. Hope you like it.

Wrote on 14-08-2017

बैठे बैठे आज मैं फिर यही ख्वाब देखती हूँ कि हाँ,  
इस पल मैं भी कुछ नया कर सकती हूँ ।
पर इस संसार की चार दीवारी में जकड़ी रहती हूँ, 
मैं फिर आज, वहीं की वहीं ठहरी हुई रहती है।

काश कि मेरे ये ख्वाब, कभी हकीकत में बदल जाते, 
और हकीकत बनकर कभी लोगों को भी बदल जाते।
काश कि मेरी ये खामोशी, कभी अलफाज़ में बदल जाती,
और अलफाज़ बनकर, कभी गीतों में गुनगुना जाती।

दिल करता है, कि आज फिर से एक ख्वाब जगाऊँ,
और उसको पूरा करते हुए, आसमान को छू जाऊँ।
लोग अकसर मुझसे ये कहा करते हैं कि,
ख्वाब देखने वालो के महल ढह जाया करते हैं।

पर ऐ मेरे यारों, कभी ये सोचा है क्या तुमने,
कि ताजमहल बनवाने वालों ने भी, ख्वाब जगाया था मनमें।
ये ख्वाबों कि दुनि‌या ही यारों, कब हकीकत में बदल जाती है,
ना देखने वालों को सिर्फ एक बर्बादी सी ही नज़र आती है।

Picture of the day ✌️


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